हवा में आने के बाद कमजोर हो जाता है कोविड-19 का वायरस, स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

नई दिल्लीः कोरोना वायरस का संक्रमण दुनियाभर में लगातार बढ़ता जा रहा है. इस बीच कोविड-19 के वायरस को लेकर नया खुलासा हुआ है और एक रिसर्च में पता चला है कि वायरस हवा में रहने के 20 मिनट के भीतर संक्रमित करने की 90 प्रतिशत क्षमता खो देता है. ऐसे में बताया गया है कि कोविड संक्रमण को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनना सबसे प्रभावी साधन है. 

करीब होने में होता है अधिक खतरा

एरोसोल रिसर्च सेंटर के डायरेक्टर और इस रिसर्च के प्रमुख लेखक जोनाथन रीड के अनुसार लोग खराब वेटिंलेशन वाले इलाके में रहकर सोचते हैं कि एयरबोर्न संक्रमण से दूर रहेंगे. उन्होंने कहा कि मैं यह नहीं कहता कि ऐसा नहीं है लेकिन यह भी तय है कि एक दूसरे के करीब रहने से ही कोरोना संक्रमण फैलता है. उन्होंने कहा कि जब एक शख्स से दूसरे शख्स के बीच कुछ दूरी होती है तो वायरस अपनी संक्रामकता खो देता है क्योंकि ऐसे में उसका एरोसोल पतला होता जाता है. ऐसी स्थिति में वायरस कम संक्रामक होता है.

शोध के लिये तंत्र किया गया विकसित

उन्होंने कहा कि यह अच्छी तरह से पता है कि वायरस फेफड़ों में उत्पन्न बूंदों और एरोसोल के माध्यम से फैलता है. यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टो के एरोसोल रिसर्च सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा तंत्र विकसित किया है, जो हवा में रहने पर वायरस कितने समय तक जीवित रह सकता है, इसका सटीक अनुमान लगाता है. द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, शोध की अभी समीक्षा की जानी है कि कोरोना वायरस हवा में कैसे फैलता है. वायरस के हवा में होने पर क्या होता है. शोधकर्ताओं ने वायरस युक्त कण उत्पन्न करने के लिए एक उपकरण विकसित किया और उन्हें नियंत्रित वातावरण में 5 सेकंड से 20 मिनट के बीच दो इलेक्ट्रिक रिंगों के बीच फैलने दिया. 

आर्द्रता कम होने पर भी वायरस होता है कमजोर

शोध के अनुसार, जब वायरल कण फेफड़ों से बाहर निकलते हैं, तो वे जल्दी पानी खो देते हैं और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के निम्न स्तर के परिणामस्वरूप पीएच में तेजी से वृद्धि होती है. यह मानव कोशिकाओं को संक्रमित करने की वायरस की क्षमता को प्रभावित करता है. एक विशेष जगह, जहां आसपास की आर्द्रता आमतौर पर 50 प्रतिशत से कम होती है, वायरस पांच सेकंड में आधा संक्रामक हो जाता है, जिसके बाद संक्रामकता में कमी धीमी और अधिक क्रमिक हो जाती है. जीव वैज्ञानिकों ने इसका अल्फा सहित सभी तीन Sars-CoV-2 वेरिएंट पर समान प्रभाव देखा. अब आने वाले हफ्तों में ओमिक्रॉन वेरिएंट के साथ प्रयोग भी शुरू करने वाले हैं.