बेहद फलदायी है डीडवाना का शक्तिपीठ महाकाली अखाड़ा, दूर होती है भूत-प्रेतों की समस्या

Nagaur: डीडवाना को उपकाशी और आभानगरी के नाम से भी जाना जाता है. उपकाशी उपनाम के पीछे कई कारण माने जाते हैं. 

ऐसा माना जाता है कि डीडवाना अति प्राचीन नगर है और किसी समय विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के किनारे बसे होने के कारण या बहुत ही समृद्ध और संपन्न नगर होने के साथ साथ धार्मिक नगर भी हुआ करता था. यही वजह थी कि इसको उपकाशी के नाम से भी जाना जाता है.

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ऐसा माना जाता है कि वर्तमान डीडवाना से पूर्व दिशा में स्थित सिंघी बॉस और मेदासर बॉस ही पुराना डीडवाना हुआ करता था. इस पुराने नगर के पास सरस्वती नदी के किनारे बीहड़ जंगल हुआ करता था, जिसे दंडीवनक के नाम से जाना जाता था और उसी से अपभ्रंश होकर इस नगर का नाम डीडवाना पड़ा. घना जंगल और साथ ही हिन्दू धर्म के लिए पवित्र और पूज्य माने जाने वाली सरस्वती नदी के कारण अतीत में यह क्षेत्र साधु-सन्यासियों की तपस्या स्थली भी रहा है. प्राचीन सिंघी बॉस के नजदीक ही जो वन क्षेत्र हुआ करता था, उसे आज भाटी बॉस के नाम से जाना जाता है और यहीं स्थित है प्राचीन शक्ति पीठ महाकाली अखाड़ा. 

किसने की थी महाकाली अखाड़े की स्थापना 
महाकाली अखाड़े की स्थापना सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भर्तहरी ने की थी. ऐसा माना जाता है कि राजा भर्तहरी को यहां भगवान शिव के अवतार गुरु गोरक्षनाथ ने यहां वैराग्य की दीक्षा दी थी और यहीं से नाथ संप्रदाय के वैरागी पंथ की शुरुआत हुए थी. वैराग लेने के बाद राजा भर्तहरी ने तपस्या करने के लिए यहां इस महाकाली मंदिर अखाड़े की स्थापना की थी और बाद में यहीं पर लम्बे काल तक तपस्या की थी. महाकाली शक्तिपीठ की स्थापना का काल 2100 वर्ष पूर्व माना जाता है (राजा विक्रमादित्य के विक्रम संवत की शुरुआत से 40 वर्ष पूर्व). ऐसा माना जाता है कि राजा भर्तहरी और उनके शिष्य गोपीचंद अपनी इस तपस्या स्थली पर हर 12 वर्ष बाद यहां अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं और कुछ समय मंदिर में व्यतीत करने के बाद अंतर्धान हो जाते हैं. वो जिस जगह पर आकर बैठते हैं. इस स्थान पर एक चबूतरा बना हुआ है, जिसे भर्तहरी चबूतरे के नाम से जाना जाता है. मंदिर के वर्तमान स्वरुप का जीर्णोद्धार 1992 में करवाया गया था. 

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अनोखा है यहां का चमत्कार
वर्तमान समय के हिसाब से अगर बात की जाए तो जीर्णोद्धार करवाते समय मंदिर परिसर में मार्बल जड़वा दिया गया था लेकिन एस तपोस्थली की करामत और चमत्कार माना जाता है कि आज भी इस पक्के फ़र्श से भी जगह-जगह से घी और भभूति निकलती है और लोगों की आस्था है कि इस घी और भभूति (विभूति) के लगाने मात्र से कई असाध्य रोगों से छुटकारा मिल जाता है या घी और विभूति केवल मंदिर परिसर के फर्श से ही निकलते हैं मंदिर परिसर की सीमा के बाहर इसका कोई अंश नहीं मिलता. मंदिर के पुजारी सोहनलाल योगी जो मंदिर में होने वाले चमत्कारों पर शोध भी कर रहे हैं ने बताया कि मंदिर से निकलने वाले घी और भभूति के बारे में अगर वैज्ञानिक तथ्यों से बात करें तो यह स्थल किसी समय साधना का बड़ा केंद्र रहा है. इस वजह से संभव है कि यहां लम्बे समय तक हवन और यज्ञ हुए हों. 

लंबे समय तक हुआ होगा घी का उपयोग
हवन करते समय क्योंकि घी का बहुत ज्यादा उपयोग किया जाता रहा होगा, इस वजह से वो घी की मात्रा संभवतः आज भी जमीन के नीचे मौजूद हों और वहीं घी मार्बल के फर्श होने के बावजूद बाहर निकल रहा है लेकिन यहां विचारणीय पहलू यह है कि यह घी और भभूति केवल 25 गुना 60 फीट में बने महाकाली मंदिर से ही निकलता है जबकि इसी सटकर बने शिवालय में इसका कोई असर नहीं है यानि यह घी और भभूति केवल महाकाली मंदिर की हद में ही निकलता है, उसके बाहर नहीं. दोनों शिवालय में जाने के लिए जो रास्ता है, वह भी महाकाली मंदिर से जाता है लेकिन इस मंदिर की परिधि के एक इंच बाद ही यहां कुछ नहीं है. फर्श से निकलने वाला यह घी और भभूति ऐसा नहीं है कि केवल मार्बल के जॉइंट से ही निकलता है बल्कि मार्बल के सख्त धरातल को चीर कर भी यह घी और भभूति बाहर निकलता है.

मंदिर से जुड़ी मान्यताएं
लोगों की आस्था है कि मंदिर परिसर में निकलने वाले घी और विभूति से असाध्य रोगों से मुक्ति मिल जाती है. इसके अलावा भी यहां की मान्यता है कि जिस किसी इंसान पर अगर भूत प्रेत का साया हो या कोई मानसिक रोगी हो तो इस मंदिर की केवल 7 परिक्रमा लगाने मात्र से सही हो जाते हैं. इसके लिए अलग से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं पड़ती केवल परिक्रमा देने मात्र से इंसान को इन व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है. यहां शनिवार और रविवार को भारी भीड़ रहती है. 

बड़े रोगों को भी ठीक करती हैं माता
कुछ लोग अपनी आस्था से यहां पहुंचते हैं तो कुछ लोग रोगों से ग्रसित होने के बाद लेकिन यहां आने के बाद लोगों को विश्वास है कि वो सही हो जाते हैं. श्रद्धालुओं की मानें तो कई बार ऐसे रोगी यहां आते हैं, जिनको धरती का भगवान माने जाने वाले चिकित्सक जवाब दे जाते हैं लेकिन यहां आने के बाद उन रोगियों को यह विश्वास हो जाता है कि महाकाली  की शक्ति के सामने कुछ भी असंभव नहीं है. भूत प्रेत बाधाओं से पीड़ित लोग यहां दूर दराज से आते हैं मंदिर के पुजारी सोहन लाल योगी का कहना है कि वर्तमान समय में क्योंकि वैज्ञानिक युग है इसलिए लोग ऐसी बातों पर विश्वास नहीं करते लेकिन जो इस परा शक्तियों की गिरफ्त में आ जाता है. वो कई ओझाओं और तांत्रिकों के चक्कर में बर्बाद हो जाते हैं. लाखों रुपये बर्बाद करने के बाद भी उनको निदान नहीं मिलता लेकिन इस शक्ति पीठ में अगर श्रद्धा से केवल सर ही झुका दे तो उनको इन व्याधियों से छुटकारा मिल जाता है और ऐसे हजारों लोग यहां सही हुए हैं, वो भी बिना एक पैसा खर्च किये.

संत ने ली थी जीवित समाधि
यह मंदिर क्योंकि नाथ संप्रदाय के वैराग पंथ का उद्गम स्थल है इस लिए यह तंत्र साधना का केंद्र माना जाता है. यहां प्राचीन समय से ही सिद्धियां प्राप्त करने के लिए नाथ संप्रदाय के कई गुरु हुए और सिद्धियां प्राप्त की जिन्होंने अपने समय में कई पर्चे (चमत्कार) दिए. विक्रम संवत 1016 में यहां के औघड़ संत संत बिकाराम ने 6 माह तक बिना अन्न जल ग्रहण किये तपस्या की थी और बाद में उन्होंने यही मंदिर परिसर में ही जीवित समाधि ली थी.

नाथ संप्रदाय के 12 पंथों में से तीन पंथों की उपाती डीडवाना से 
संवत 1698 पुनः गोरखनाथ जी का डीडवाना में इस तपोभूमि पर आगमन हुआ तब डीडवाना के संत हरिदास जी महाराज को इन्होंने आशीर्वाद दिया. संत हरिदास बाद में दयाल महाराज के नाम से प्रसिद्द हुए और डीडवाना में ही निरंजनी (संप्रदाय) पंथ की स्थापना की. इसी दौरान बीहड़ जंगलों में खेती करने वाले किसान बिंजाराम माली से गोरखनाथ जी के पानी पीने की बात को लेकर उलटे संवाद हुए जो की औघड़ पंथ का मुख्य विषय होता है. इस घटना के पश्चात ही औघड़ पंथ की उत्पति हुई, जिसका उत्पति स्थल भी डीडवाना माना जाता है इस प्रकार नाथ संप्रदाय के 12 पंथों में से तीन पंथों की उपाती डीडवाना से मानी जाती है. पहला विराग पंथ दूसरा निरंजनी पंथ और तीसरा औघड़ पंथ.

जानिए मंदिर से जुड़ा ऐतिहासिक घटनाक्रम
एक ऐतिहासिक घटनाक्रम भी इस स्थान से जुड़ा हुआ है, जब संवत 1826 में यहां संत मनोहर नाथ हुए थे. उनके समय में वीर दुर्गादास को उनके चाचा के साथ इसी मंदिर और बीहड़ में इनको छुपाकर रखा गया था. मनोहरनाथ के एक शिष्य जिनका नाम सुमेरगिरी था. मंदिर में शेर का रूप धारण करके तपस्या करते थे. एक बार जब वो शेर के रूप में तपस्या में लीन थे, तो यहां के ही जटिया मोहल्ला के कुम्हार परिवार की एक महिला बरजा देवी ने उनको देख लिया. मंदिर में शेर को देखकर महिला घबरा गई और मंदिर को कुण्डी लगाकर अपने घर लौट गई. मंदिर के बाहर कुण्डी लग जाने के कारण सुमेरगिरी 7 दिन तक मंदिर में ही बैठे रहे. बाद में योगबल से सुमेरगिरी ने मंदिर के उत्तर में 3 फिट दरवाजा बनाकर बाहर निकले.

महाकाली प्रतिमा के सामने 13 दिन तक नाचे चेतन दास 
विक्रम संवत 2011 में यहां के चेतन दास महाकाली प्रतिमा के सामने लगातार 13 दिन तक अनवरत नाचते रहे, जो बाद में सीकर के संगलिया धाम के गुलाबदास के शिष्य बने और और कालांतर में संगलिया पिथाधिपति बने और संगलिया पीठ के ख्यात संत के रूप में प्रसिद्ध हुए.

लोगों को रोगों से छुटकारा मिलता है यहां
मंदिर की की ख्याति वर्तमान में देश प्रदेश में है और दूर-दूर तक है और लोग अपने रोगों और व्याधियों के निदान के लिए यहां आते हैं. आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग इस आस्था के केंद्र से जुड़े हुए हैं. इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यही है कि लोगों को रोगों से छुटकारा मिलता है. भले ही विज्ञान और चिकित्सा प्रणाली ने तरक्की कर ली है लेकिन बावजूद इस शक्तिपीठ की ख्याति कभी कम नहीं हुई. मेडिकल साइंस ने जिस रोगी के उपचार में हाथ खड़े कर दिए हों, ऐसे रोगियों को भी यहां से राहत मिली है, जिनकी संख्या सैकड़ों में नहीं बल्कि हजारों में है.

Reporter- हनुमान तंवर