UP Power Crisis: जरूरत के समय काम आ सकते थे न्यूक्लियर रिएक्टर्स, लेकिन क्यों नहीं हुए सफल?

नई दिल्ली: देश के साथ उत्तर प्रदेश में भी बीते कुछ दिनों से बिजली संकट को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. कोयले के कमी होने की वजह से यूपी में खलबली मच गई है. इसी तरह अगर कोयले की कमी रही, तो आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में भीषण बिजली संकट हो सकता है. इस परेशानी को दूर करने के लिए यूपी पावर कॉर्पोरेशन (UPPCL) को एनर्जी एक्सचेंज से 15- 20 रुपये प्रति यूनिट बिजली खरीदनी पड़ रही है. बिजली की कीमत अधिक होने की वजह से पावर कॉर्पोरेशन ज्यादा मात्रा में बिजली नहीं खरीद पा रहे हैं. अधिकारियों का कहना है कि 15 अक्टूबर तक कोई सुधार की उम्मीद भी नहीं है. बता दें, कोयले की कमी होने के कारण पावर कॉर्पोरेशन को बिजली देने वाले 8 पावर प्लांट बंद चल रहे हैं. साथ ही, 6 पावर प्लांट तकनीकी खराबी के चलते बंद हैं.

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कोयले की कमी से बिजली की कटौती होनी शुरू हो गई है. शहरी इलाकों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में लाइट ना होने के कारण लोग परेशान हैं. घंटों तक बिजली ना होने से लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. बात करें उत्तर प्रदेश में मौजूदा समय की तो इस वक्त राज्य में 20 से 21 हजार मेगावॉट बिजली की मांग है, जबकि सप्लाई सिर्फ 17 हजार मेगावॉट बिजली की ही हो रही है. इस संकट का सबसे अधिक असर पूर्वांचल और ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रहा है.

यूपी के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने इसपर लोगों से अनावश्यक बिजली का इस्तेमाल न करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि बिजली का इस्तेमाल कम करें, ताकि गांव और गरीबों तक इसे पहुंचाया जा सके. फिलहाल, ऊर्जा मंत्री बिजली आपूर्ति की समीक्षा कर रहे हैं. उन्होंने UPPCL के चेयरमैन और सभी डिस्कॉम के एमडी के साथ बैठक कर निर्देश दे दिये हैं कि गांव और शहरी क्षेत्रों में शाम 6.00 से सुबह 7.00 बजे तक लोगों को पूरी बिजली दी जाए.

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देखिए यह तो थी उत्तर प्रदेश की बात, लेकिन हम अब जानेंगे कि इसके पीछे का कारण क्या है, जिसकी वजह से आज बिजली का संकट उत्पन्न हुआ है. दरअसल, साल 2005 में भारत और अमेरिका के बीच एक परमाणु समझौता हुआ था. ऐसा माना जा रहा था कि इस समझौते से आने वाले समय में भारत को बिजली की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. इस बड़ी साझेदारी को लगभग 15 साल से अधिक समय हो चुके हैं, लेकिन भारत के बिजली उत्पादन में परमाणु की स्थिती करीब-करीब स्थिर ही है. एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2001 में भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी 3.7 प्रतिशत थी. वहीं, आज घटकर यह केवल 3.3% हो गई है.

वहीं कुछ ऐसे देश भी हैं, जो परमाणु बिजली की पैदावर पर शीर्ष पर चल रहे हैं. इसमें सबसे ऊपर फ्रांस का नाम है. फ्रांस 70.6 प्रतिशत बिजली परमाणु संयंत्रों में पैदा करता है. साथ ही, दूसरे नंबर पर यूक्रेन है जो 51.2 प्रतिशत ऊर्जा परमाणु की जरूरतों को पूरी करता है. फिलहाल भारत के पास अभी कुल 388.1 गीगावॉट बिजली पैदा करने की क्षमता है, इसमें 234 गीगावॉट का उत्पादन थर्मल प्लांट्स से होता है. बाकी लगभग 85 प्रतिशत का उत्पादन सोलर, वायु और पानी से होता है.

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आपको बता दें, परमाणु बिजली की लागत लगभग कोयले से पैदा होने वाली बिजली जितनी ही है, लेकिन बीते कुछ सालों से सौर और वायु बिजली की लागत में भारी कमी सामने आई है. इसी वजह से परमाणु बिजली के साथ-साथ सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी एक गंभीर विषय बनी हुई हैं. ऐसे में भारत ने इसपर ज्यादा फोकस नहीं किया. हालांकि, सरकार ने कई बार यह कहा है कि न्यूक्लियर एनर्जी भारत की इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई के लिए अच्छा सोर्स है, लेकिन इसपर ज्यादा काम नहीं हुआ, जबकि जल और सौर ऊर्जा को लेकर देश ने अच्छी तरक्की की है.

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