Hindi Diwas 2021: 1881 में बिहार में राजभाषा बन गई थी हिंदी, बना था मान्यता देने वाला पहला राज्य

Patna: हिंदी की बात हो और बिहार के संदर्भ में इसका जिक्र हो तो आपको अनायास ही हिंदी के साथ ठेठ गंवई शब्दों का वह मीठा शब्द सम्मुच्चय याद आ जाएगा जिसको सुनकर आपके चेहरे पर मुस्कान तैर उठेगी. एक ऐसा राज्य जहां की क्षेत्रीय भाषाओं में हिंदी का अपना प्रभाव हमेशा से बना रहा. बातचीत में हिंदी के साथ क्षेत्रीय भाषा के शब्द ऐसे घुले मिले की पता ही नहीं चलता कि दोनों का कोई अलग रूप होगा.  

देश में भले ही 14 सितंबर 1949 को आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को मान्यता मिली हो, लेकिन 1881 ईस्वी में हिंदी को राजभाषा के रूप में बिहार अपना चुका था. मतलब बिहार के साथ हिंदी और हिंदी के साथ बिहार दोनों एक दूसरे से तब से जुड़े थे जब हम अंग्रेजी हुकूमत की बेड़ियों में जकड़े पड़े थे. लेकिन तब भी हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता देने वाला बिहार पहला राज्य बना था. मतलब साफ है कि हिंदी भाषा की जड़ें गहरे तक बिहार की संस्कृति और बोलचाल में रच बस गई थी. 

एक रिसर्च रिपोर्ट की मानें तो भारत में 77 प्रतिशत के करीब लोग हिंदी भाषा पढ़ते, लिखते और इसमें संवाद करते हैं. लेकिन यही रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि बिहार में यह प्रतिशत कहीं ज्यादा है. बिहार में हिंदी ज्यादातर दफ्तरों के कामकाज की भी भाषा है. 

1918 में महात्मा गांधी (Mahatma gandhi) ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने पर जोर दिया था. गांधी जी हिंदी को जनमानस की भाषा कहते थे. उन्हें पता था कि देश की बड़ी आबादी हिंदी समझती, पढ़ती, लिखती और बोलती है. गांधी जी जब बिहार में थे तो उन्हें यहां जिस तरह हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का मेल संवाद का तरीका बनते दिखा उससे वह बहुत प्रसन्न हुए थे. फिर देश की आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान की धारा 343 के तहत 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाने का फैसला लिया गया. 

आपको शायद ग्रियर्सन की किताब लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया याद हो जिसमें हिंदी के रूप में बिहारी भाषा के स्वरूप का जिक्र है. ग्रियर्सन इस किताब में लिखते हैं कि उत्तरी और दक्षिणी बिहार के लोगों द्वारा सम्मिलित रूप से एक भाषाएं बोली जाती थी, जिसमें मैथिली, भोजपुरी, अंगिका आदि का मिश्रण होता था. ग्रियर्सन ने इसे ही बिहारी भाषा कहा. लेकिन उन्होंने यह माना कि इन भाषाओं पर हिंदी का बड़ा प्रभाव है और इसमें हिंदी के शब्दों को बड़ी बेहतरी से आत्मसात कर लिया गया है.

हिंदी भाषा से बिहार की धरती का लगाव ऐसा रहा कि हिंदी साहित्यकारों की एक पूरी जमात इस मिट्टी ने पैदा कर दी. इसी मिट्टी में राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह दिनकर ने जन्म लिया. जिनकी कविता के ओज के सामने संसद का सभागार भी शांत हो जाता. यही नहीं कितने नाम गिनाऊं जिन्होंने यहां की मिट्टी में पैदा होकर हिंदी को समृद्ध और समृद्ध किया. नागार्जुन हों या फणीश्वरनाथ रेणु, विद्यापति या भिखारी ठाकुर साहित्य इनकी कलमों ने हिंदी में उगले और शब्दों की एक नई श्रृंखला खड़ी कर दी. जिसमें कुछ ठेठ देहाती शब्द जिन्होंने हिंदी की विकास यात्रा को और बेहतर बनाया. 

बिहार के कई साहित्यकार तो ऐसे रहे जिनके साहित्यिक सृजन का एक-एक मोती हिंदी भाषी लोगों के लिए एक उपहार से कम नहीं है. गोपाल दास नेपाली, स्वामी सहजानंद सरस्वती, आर्यभट्ट, रामवृक्ष बेनीपुरी, जानकी बल्लभ शास्त्री, नारायण पंडित, वात्स्यायन, विष्णु शर्मा, ज्योतिरीश्वर ठाकुर, शिवपूजन सहाय, महेश नारायण, नलिन विलोचन शर्मा, देवकी नंदन खत्री, सरहपा ऐसे कितने नाम गिनाऊं. ये संख्या तो कई सौ में है. हिंदी के प्रथम खड़ी बोली के लेखक महेश नारायण भी इसी मिट्टी की उपज रहे. देवकी नंदन खत्री का उपन्यास चंद्रकांता किसी के दिमाग से हटा नहीं होगा, आर्यभट्ट की आर्यभटियम को कौन भूल पाया होगाा. खैर देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद  की किताब इंडिया डिवाइडेड याद हो तो जरूर पढ़िए, हिंदी के लिए बिहार और बिहार के लिए हिंदी क्या थी आप बेहतर समझ पाएंगे.