UP Vidhansabha Chunav 2022: डिबाई विधानसभा सीट पर इस जाति का है दबदबा, कल्याण सिंह भी जीत चुके हैं यहां से चुनाव

बुलंदशहरः उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट गई हैं. इसी बीच हम बात करते हैं बुलंदशहर जिले की डिबाई विधानसभा सीट की. डिबाई विधानसभा सीट की गिनती उत्तर प्रदेश की अहम विधानसभा सीटों में होती है. क्योंकि एक तरफ यह विधानसभा क्षेत्र राजनीतिक नजरिए से अहम माना जाता है, तो दूसरी तरफ ऐतिहासिक नजरिए से भी यह विधानसभा क्षेत्र उत्तर प्रदेश में अपनी एक अलग पहचान रखता है. ऐसे में आज हम आपको डिबाई विधानसभा सीट के सियासी समीकरमणों में बताएंगे. 

ऐतिहासिक जगह है डिबाई 
डिबाई विधानसभा सीट ऐतिहासिक क्षेत्र माना जाता है, डिबाई से कुछ ही दूरी पर गंगा नदी है, तो इस जगह सीधा संपर्क महाभारत काल से भी माना जाता है. डिबाई विधानसभा क्षेत्र में कर्णवास गांव आता है. कहा जाता है यह गांव महाभारत के योद्धा दानवीर कर्ण का गांव है. जहां से वह लोगों को दान करते थे.  इसके अलावा गंगा किनारे बसा यह विधानसभा क्षेत्र धार्मिक लिहाज से भी अहम रहता है. जबकि काटन और कपास की भी यहां अच्छी पैदावार होती है. इसलिए इस विधानसभा सीट पर सबकी नजरे रहती है. 

2017 में बीजेपी जीती थी चुनाव 
उत्तर प्रदेश में 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में डिबाई विधानसभा सीट पर बीजेपी की अनीता लोधी राजपूत ने जीत दर्ज की थी. उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हरीश लोधी को चुनाव हराया था. बीजेपी प्रत्याशी को चुनाव में 1,11,804 वोट मिले थे, जबकि सपा प्रत्याशी को 40,177 वोट मिला था. जबकि तीसरे नंबर बसपा प्रत्याशी देवेंद्र भारद्वाज रहे थे. जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां सपा को जीत मिली थी. सपा के भगवान शर्मा ने जनक्रांति पार्टी के राजवीर सिंह को हराया था. 

जातिगत समीकरण 
वही बात अगर डिबाई विधानसभा सीट के जातिगत समीकरणों की जाए तो यहां लोध राजपूत वोटर निर्णायक भूमिका में रहते हैं. इसके अलावा मुस्लिम और दलित वोटर भी प्रभावी भूमिका में रहते हैं. जबकि ठाकुर, ब्राह्मण, और वोटर भी प्रभारी रहते हैं. इसके अलावा क्षेत्र में वेश्य वोटर भी है. खास बात यह है कि लोध राजपूत वोटर डिबाई में 1 लाख से भी ज्यादा है. जबकि दलित 50 हजार दलित वोटर और 30 हजार से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं. ऐसे में यहां पार्टियां इन्ही वर्गों से आने वाले प्रत्याशियों पर दांव लगाती है. 

डिबाई विधानसभा सीट का सियासी सफर 
1952 में अस्तित्व में आई डिबाई विधानसभा सीट पर लोध राजपूत वोटर की संख्या निर्णायक होने से यहां की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का सीधा दखल रहता है. कल्याण सिंह खुद इस सीट से विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं, हालांकि दो सीटों से चुनाव लड़ने के चलते उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन यहां की राजनीति में उनका सीधा असर रहता है. वही कल्याण सिंह के चलते इस सीट पर जनसंघ और बीजेपी की अच्छी पकड़ मानी जाती है. अब तक हुए 18 चुनावों में से यहां जनसंघन ने 6 बार जीत दर्ज की है. 

  • 1952 में डिबाई सीट पर कांग्रेस के इर्तजा हुसैन ने जीत दर्ज की 
  • 1957 के चुनाव में जनसंघ के प्रत्याशी हिम्मत सिंह ने जीत हासिल की 
  • 1962, 1967, 1969, 1974 और 1977 में भी हिम्मत सिंह लगातार 6 बार चुनाव जीते 
  • 1980 में नेम पाल सिंह डिबाई में फिर से कांग्रेस की वापसी कराई 
  • 1985 में कांग्रेस की हितेश कुमारी चुनाव जीती 
  • 1989 में जनता दल के नेम पाल सिंह को जीत मिली 
  • 1991 में बीजेपी ने पहली बार चुनाव जीता 
  • 1993 में भी बीजेपी की जीत का सिलसिला जारी रहा
  • 1996 पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने यहां चुनाव जीता 
  • 1997 के उपचुनाव में बीजेपी के राम सिंह चुनाव जीते 
  • 2002 में कल्याण सिंह बेटे राजवीर सिंह ने यहां चुनाव जीता 
  • 2007 में पहली बार बसपा के भगवान शर्मा (गुड्डू पंडित) चुनाव जीते 
  • 2012 में भगवान शर्मा समाजवादी पार्टी में शामिल हुए और सपा ने यहां जीत दर्ज की 
  • 2017 में अनीता लोध राजपूत ने यहां बीजेपी की वासपी कराई 

2017 के विधानसभा चुनाव के हिसाब से डिबाई विधानसभआ सीट पर 3 लाख 33 हजार 300 वोटर थे. जिनमें से पुरुष वोटरों की संख्या 1 लाख 78 हजार 304 थी, जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 1 लाख 55 हजार 15 थी. इस सीट पर किसी एक दल का दबदबा नहीं रहा है, लेकिन जो पार्टी लोध राजपूत प्रत्याशी पर दांव लगाती है उसकी जीत के चांस बढ़ जाते हैं. इसलिए सभी दलों की नजर इस वर्ग से आने वाले प्रत्याशी पर रहती है. 

2017 में कैसा था उत्तर प्रदेश का जनादेश 
2017 में हुए विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में चौकाने वाले परिणाम सामने आए. बीजेपी ने राज्य की 403 सीटों में से 312 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी. समाजवादी पार्टी को 54 सीटें और बहुजन समाज पार्टी को 19 सीटों पर जीत मिली थी. जबकि बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल को 12 और कांग्रेस को महज 7 सीटें ही मिली थी. 

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