अब अंतरिक्ष को उद्योग बनाएगा भारत? स्पेस में इसरो और प्राइवेट सेक्टर की होगी जुगलबंदी

नई दिल्ली: पिछले कुछ दिनों में दुनिया के कई बड़े उद्योगपति अपनी प्राइवेट स्पेस कंपनियों के जरिए आम लोगों को अंतरिक्ष में भेज चुके हैं. ये देखकर भारत के लोग सोचते होंगे कि क्या कभी वो भी टिकट खरीदकर ऐसे ही अंतरिक्ष में छुट्टियां मना पाएंगे. भारत में ऐसा करने की क्षमता सिर्फ इसरो (Indian Space Research Organization) के पास है, लेकिन ISRO एक सरकारी संस्था है, जिसका काम भारत के उन अंतरिक्ष अभियानों को अंजाम देना है, जिनकी फंडिंग भारत सरकार से होती है. लेकिन अब भारत ने इस दिशा में एक नई पहल की है और अब भारत की बड़ी बड़ी प्राइवेट कंपनियां भी अंतरिक्ष में अवसर ढूंढ पाएंगी.

पीएम मोदी ने लॉन्च किया इंडियन स्पेस एसोसिएशन

अक्सर कहा जाता है कि देश में भी जो भी सुधार होते हैं वो जमीन पर दिखाई देने चाहिए, लेकिन ये भारत की स्पेस पॉलिसी (Space Policy) में हुआ एक ऐसा सुधार है, जिसका असर जमीन पर नहीं बल्कि आसमान और अंतरिक्ष में दिखाई देगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडियन स्पेस एसोसिएशन (Indian Space Association) को लॉन्च कर दिया है. इसके बाद अब भारत की प्राइवेट कंपनियां भी स्पेस रेस में शामिल हो पाएंगी. इसरो (ISRO) कम खर्च में अंतरिक्ष अभियानों को पूरा करने के मामले में पूरी दुनिया में मशहूर है और अब इसरो व प्राइवेट कंपनियों की मदद से भारत अंतरिक्ष की एक सुपर पावर बन सकता है. शुरुआत 8 प्राइवेट कंपनियों के साथ की गई है.

क्यों लॉन्च किया गया इंडियन स्पेस एसोसिएशन

इंडियन स्पेस एसोसिएशन (Indian Space Association) को लॉन्च करने के पीछे चार मकसद हैं. पहला- अंतरिक्ष में प्राइवेट सेक्टर को नई-नई खोज करने के लिए प्रेरित करना. दूसरा- सरकार की मदद से प्राइवेट कंपनियों को अंतरिक्ष उद्योग में नए मौके देना. तीसरा- भारत के अंतरिक्ष उद्योग को आगे बढ़ाने में सक्षम लोगों को मौका देना. और चौथा ये सुनिश्चित करना कि अंतरिक्ष का इस्तेमाल सबके भले के लिए हो पाए.

ये प्राइवेट कंपनियां क्या करेंगी?

ये इसरो (ISRO) के लिए नए रॉकेट (Rocket) बना पाएंगी. अपने खुद के सेटेलाइट (Satellites) विकसित कर सकेंगी और इसरो के संसाधनों का इस्तेमाल करके अपने रॉकेट, स्पेस शटल और सेटेलाइट को अंतरिक्ष में भेज पाएंगी. इसकी शुरुआत सेटेलाइट इंटरनेट (Satelite Internet) के जरिए हो भी गई है. भारत की एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी अपनी एक सब्सिडियरी कंपनी के जरिए अंतरिक्ष में 648 सेटेलाइट भेजेगी और ये सेटेलाइट इसरो के GSLV Rocket के जरिए भेजे जाएंगे. ये सेटेलाइट भारत के शहरों समेत दूर दराज के इलाकों तक हाई स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचाने में सक्षम होंगे. ये वो इलाके हैं, जहां इंटरनेट के लिए केबल बिछाना संभव नहीं है.

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अंतरिक्ष में भारत के नाम कई रिकॉर्ड्स

पूरी दुनिया में इस समय अंतरिक्ष उद्योग 33 लाख करोड़ रुपये का है और फिलहाल इसमें भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि अभी भारत के सभी अंतरिक्ष कार्यक्रम इसरो (ISRO) के नियंत्रण में हैं. लेकिन इसके बावजूद अंतरिक्ष में भारत के नाम कई रिकॉर्ड्स हैं. अब आप सोचिए अगर इसमें प्राइवेट कंपनियां आ गई तो क्या होगा. इसरो ने अपना मंगलयान सिर्फ 555 करोड़ रुपये में मंगल ग्रह की कक्षा तक भेजा था, जबकि अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने यही काम 5 हजार करोड़ रुपये में किया था. यूरोपियन यूनियन ने इसके लिए 3 हजार करोड़ रुपये खर्च किए थे. मंगल पर अंतरिक्ष यान भेजने में जापान के 1400 करोड़ रुपये और रूस के 800 करोड़ रुपये खर्च हुए थे.

चंद्रयान मिशन को इसरो ने सिर्फ 855 करोड़ रुपये में पूरा कर लिया था, जबकि हॉलीवुड में स्पेस पर जो फिल्में बनती हैं उनका खर्च भी इसके मुकाबले कहीं ज्यादा होता है. फिल्म Guardians of the Galaxy बनाने में 1300 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जबकि ऐसी ही एक और स्पेस फिल्म Inter-Stellar का निर्माण 1200 करोड़ रुपये में हुआ था. यानी कम लागत में मिशन भेजने के मामले में ISRO पूरी दुनिया में सबसे आगे है और यही बात प्रधानमंत्री मोदी ने Indian Space Association की लॉन्चिंग के मौके पर कही.

कैसे हुई भारत की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत?

भारत की अंतरिक्ष यात्रा साइकिल पर शुरू हुई थी. वर्ष 1963 में केरल के थुंबा में भारत ने पहला रॉकेट लॉन्च किया था और तब, रॉकेट को साइकिल से लॉन्च पैड तक ले जाया गया था और उसे थुंबा के एक चर्च से लॉन्च किया गया था. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक और महान वैज्ञानिक डॉ विक्रम साराभाई ने ही देश के पहले स्पेस मिशन (Space Mission) के लिए केरल के थुंबा को चुना था और इसकी वजह ये थी कि विक्रम साराभाई इस मिशन में कोई गड़बड़ी, या खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे. इसलिए उन्होंने एक ऐसी जगह की तलाश की, जो रॉकेट लॉन्च के लिए सही हो और सुरक्षित हो. थुंबा में ईसाई मछुआरों का एक गांव था और वहां नारियल के पेड़ों के बीच एक चर्च था, जो पृथ्वी के चुंबकीय भूमध्य रेखा के ऊपर स्थित था.

इस काम में चर्च के पादरी ने मदद की. इस दौरान डॉ विक्रम साराभाई ने रविवार के दिन सभी गांववालों को बुलाया और उन्हें बताया कि वो भारत के अंतरिक्ष वाले सपने को पूरा करना चाहते हैं. इस काम में देश को गांववालों की जरूरत है. पादरी और गांव के लोगों ने एक स्वर में चर्च को वैज्ञानिकों को सौंप दिया. भारत के वैज्ञानिकों के पास उस समय सिर्फ एक कार थी, जो हमेशा व्यस्त रहती थी. इसलिए, 21 नवंबर 1963 को रॉकेट के अलग अलग भागों को साइकिल पर ही ले जाया गया और इस तरह भारत की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत हुई.

ये रॉकेट भारत ने अमेरिका से खरीदा था, लेकिन 4 वर्ष बाद 1967 में भारत ने अपना रॉकेट बनाया और उसे थुंबा से ही लॉन्च किया गया. वर्ष 1975 में भारत ने अपना सेटेलाइट बना लिया और देश के पहले सेटेलाइट का नाम रखा गया आर्यभट्ट. इसे रूसी रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में भेजा गया. उस समय भी हमारे पास मूलभूत सुविधाओं की कमी थी, लेकिन आर्यभट्ट सेटेलाइट की लॉन्चिंग के दौरान बेंगलुरु के एक शौचालय को डाटा सेंटर में बदला गया था.

साल 1981 में भारत अपना पहला संचार उपग्रह लॉन्च करने की कोशिश कर रहा था. पेलोड (Payload) तैयार था, लेकिन चुनौती थी धातु मुक्त वाहन यानी Metal-Free Vehicle खोजने की, क्योंकि पेलोड को ले जाने के लिए ऐसे ही वाहन की जरूरत हो जो मेटल-फ्री हो. वैज्ञानिकों के सामने अब सवाल ये था कि मेटल फ्री व्हीकल क्या हो सकता है? साइकिल में भी मेटल होता है. कार या जीप में भी मेटल होता है. अब यहां पर भारत की जुगाड़ परंपरा फिर से काम में आ गई. वैज्ञानिकों ने पेलोड ले जाने के लिए बैलगाड़ी को चुना.

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