इस वीकेंड कर सकते हैं ‘Pushpa’ के नाम, फिल्म देख बॉलीवुड मूवीज को भूल जाएंगे आप

कास्ट:  अल्लू अर्जुन, रश्मिका मंदाना, अजय घोष, फहाद फासिल, सुनील, शत्रु
निर्देशक:  सुकुमार
स्टार रेटिंग:
कहां देख सकते हैं: अमेजन प्राइम पर 

नई दिल्ली: साउथ की कई भाषाओं के बॉक्स ऑफिस पर कमाल मचाने के बाद अब अमेजन प्राइम पर ‘पुष्पा द राइज’ हिंदी के दर्शकों के लिए भी उपलब्ध हो गई है. ‘बाहुबली’ के बाद शायद ही किसी साउथ की मूवी का हिंदी के दर्शकों को इतना इंतजार रहा हो, चर्चा ही इतनी हो गई है. वैसे हिंदी के आम दर्शकों से ज्यादा इसे हिंदी के एक्टर्स और डायरेक्टर्स को देखना चाहिए कि कैसे एक आम सी कहानी को तूफानी तेवर और कलेवर के जरिए एक सुपरहिट मूवी बनाया जा सकता है.

ऐसी है फिल्म की कहानी

कहानी है एक ऐसे जंगल की, जिसमें मिलने वाले लाल चंदन से जापान की शादियों में बजने वाले एक खास किस्म के वाद्ययंत्र को बनाया जाता है, वो लाल चंदन की लकड़ी को चीन से स्मगलिंग करके मुंहमांगे दामों में मंगाते हैं, जबकि पैदा वो लकड़ी केवल साउथ इंडिया के एक जंगल में ही होती है. भारत में इन पेड़ों को काटना मना है और फिर भी काटना और चीन तक स्मग्ल करके पहुंचाना, ये एक बड़ा अंडरवर्ल्ड गेम है, जिसमें एक स्टाइलिश, गरीब मजदूर ‘पुष्पा राज’ (अल्लू अर्जुन ) उतर जाता है, जिसे अपने गांव में नाजायज औलाद के रूप में माना जाता है. कैसे अपने ‘दिमाग और दुस्साहस’ के जरिए वो स्थापित स्मगलरों और गैंगस्टर्स को हटाकर सिंडिकेट का मुखिया बनता है, यही कहानी है, जो ना जाने कितनी बार बॉलीवुड की फिल्मों में दोहराई जा चुकी है. 

पसंद आएगा अल्लू अर्जुन का स्टाइल

बावजूद इसके फिल्म पसंद की जा रही है, तो उसकी 2 बड़ी वजहें हैं, अल्लू अर्जुन के तेवर और फिल्म का कलेवर, यानी लाल चंदन की कहानी. ‘पुष्पा से फ्लॉवर मत समझना, ये फायर है’, ये अकेला डायलॉग अल्लू अर्जुन के तेवर बताने के लिए काफी है. जिसमें आपको ‘काला’ के रजनीकांत, ‘कबीर सिंह’ के शाहिद कपूर, ‘केजीएफ’ के यश और ‘पदमावत’ के रणवीर सिंह की झलक देखने को मिलेगी, वैसी ही दाढ़ी, वैसे ही तेवर लेकिन डायरेक्टर सुकुमार की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने पूरी मूवी अल्लू अर्जुन के भरोसे ही नहीं छोड़ दी बल्कि एक एक करेक्टर ऐसा ढूंढा, जो उस कहानी का असली किरदार लगे, एक एक सीन ऐसा प्लान किया, जिसमें लगे कि दिमाग लगाया गया है, एक एक लोकेशन ऐसी ढूंढी जो आपकी आंखों को परदे पर चिपका कर रखती हो. मूवी को खास कलर्स और लाइट्स मे भी पेश किया गया है ताकि आपको देखने का अलग ही अनुभव हो.

बेहतरीन हैं सभी कलाकार

ऐसे में चाहे वो पुष्पा की प्रेमिका श्रीवल्ली के किरदार में रश्मिका मंदाना हो, मंगलम श्रीनू के किरदार में सुनील हों, कोंडा रेड्डी के किरदार में अजय घोष या फिर एसपी भंवर सिंह शेखावत के किरदार में फहाद फासिल, हर किरदार को कायदे से गढ़ा गया और सही कलाकार ढूंढा गया. एक और किरदार है, वो है ‘तरकीबें’, पुलिस से माल बचाने के लिए पुष्पा की तरकीबें, वाकई में इस मूवी का सबसे अनोखा हिस्सा है, जो मूवी में लगातार आपकी दिलचस्पी बनाए रखता है और सामने से नजर हटा नहीं पाते कि कोई सीन मिस ना हो जाए और किसी किसी सीन को रिपीट भी देखते हैं.

हर बारीकी पर किया गया काम

मूवी बॉलीवुड को ये भी सिखाती है कि कहानी जमीन की ढूंढी जानी चाहिए. कैसे एक नाजायज बच्चा जिंदगी भर तिरस्कार झेलता है, वो कानून और सरकार क्या समझेगा? डायरेक्टर ने जमीनी प्रेमिका भी ढूंढी है और इस स्तर पर होने वाली बातचीत के सीन्स भी डाले हैं कि कैसे प्रेमिका शुरू शुरू में पांच हजार रुपए के लिए एक किस देने के तैयार हो जाती है और क्लाइमेक्स दिखाता है ईगो की टशन. कैसे एक नया आईपीएस ऑफिसर पुष्पा के स्वाभिमान को चोट पहुंचाता है और कैसे पुष्पा अपना बदला लेता है. हालांकि ये सीन थोड़ा अटपटा सा था, लेकिन मूवी का प्रवाह ऐसा था कि वो बहुतों को ‘जस्टीफाई’ भी लग सकता है. 

जल्द आएगा फिल्म का दूसरा पार्ट

‘बाहुबली’ और ‘केजीएफ’ की तरह इस मूवी को भी दो पार्ट में बनाया गया है, ‘पुष्पा द राइज’ के बाद ‘पुष्पा द रूल’ देखने को मिलेगी, जो इसी साल रिलीज होगी. मूवी की स्पीड इतनी ज्यादा है कि कभी कभी गानों की जरुरत महसूस नहीं होती, फिर भी वो विजुअल रिलीफ का काम करते हैं, एक आइटम सोंग में सामंथा भी हैं. हालांकि साउथ से हिंदी में करते वक्त जो शब्दों का चुनाव होता है, उस पर बाहुबली जैसी मेहनत नहीं की गई है, सो जुबान पर आसानी से उस तरह नहीं चढ़ते.
 

फुल एंटरटेनिंग है फिल्म

कुल मिलाकर इस वीकेंड अगर आप कोई थ्रिलर फिल्म देखना चाहते हों, तो ‘पुष्पा’ आपको निराश नहीं करेगी, ये अलग बात है कि मूवी 178 मिनट यानी करीब 3 घंटे की है, सो उसको आप गाने फास्ट फॉरवर्ड करके भी समय बचा सकते हैं. लेकिन चूंकि अरसे से कोई अच्छी मूवी नहीं आई है, तो ये बढ़िया मौका हो सकता है.