लाशों के मसीहा बन चुके हैं हीरालाल साहू, 800 से ज्यादा शवों का कर चुके हैं अंतिम संस्कार

Rajasthan Hiralal Sahu: कोरोना काल में लोगों ने वो दौर भी देखा जब संक्रमण के डर से पुत्र ने अपने पिता के शव को हाथ नहीं लगाया. यहीं नहीं ऐसे भी कई मामले हुए जिनमें विवादों के कारण परिवार के व्यक्ति ही शव लेने से पीछे हट गए. ऐसे ही शवों का पिछले 10 साल से विधि विधान के साथ उदयपुर (Udaipur) के हीरालाल साहू (Hiralal Sahu) अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं. वर्ष 2011 से लेकर अब तक हीरालाल साहू 800 से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. यही नहीं अंतिम संस्कार के बाद हरिद्वार (Haridwar) जाकर हिन्दू रीति रिवाजों से अस्थि विसर्जन भी करते हैं. साहू अज्ञात शव, आर्थिक रूप से कमजोर परिवार और परिवार की तरफ से इनकार किए शवों का अंतिम संस्कार करते हैं. खास बात ये है कि पुलिस विभाग से इन्हें अज्ञात शवों (Unclaimed Dead Dody) का संभाग प्रभारी भी बनाया हुआ है.

क्या कहते हैं हीरालाल साहू 
हीरालाल साहू ने बताया कि ”वर्ष 2011 की बात है. शहर के सुखेर थाना क्षेत्र के जंगल एरिया में एक महिला का शव मिला था. मैं उधर से गुजर रहा था तो रुक गया. फिर पुलिस को रिपोर्ट लेनी थी तो मैं आगे आया और रिपोर्ट दर्ज कराई. शव का कोई परिजन नहीं मिला तो अंतिम संस्कार भी मैंने ही किया. इसके बाद तत्कालीन थाना अधिकारी राम सुमेर ने कहा था कि पुण्य का काम है इसे निरंतर चालू रखें, परिवार सदस्यों से बात की तो उन्होंने भी सहयोग किया.”

मिलता है सुकून 
हीरालाल साहू ने बताया कि ”वर्ष 2011 से अब तक 800 से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार कर चुका हूं. ये काम करता हूं तो मन मे सुकून मिलता है. लगता है कि किसी अपने को भगवान के श्री चरणों में सुपुर्द कर रहा हूं. कभी जेल से कैदी का शव आता है तो कभी ट्रेन से कटे हुए युवक का, लेकिन सभी की अंतिम क्रिया विधि विधान के साथ पूरी होती है.” 

हरिद्वार में करते हैं अस्थि विसर्जित
हीरालाल साहू ने ये भी बताया कि ”अंतिम संस्कार के बाद सभी की अस्थियां एकत्र करते हैं. फिर एक साल में 100-150 अस्थियां हो जाती हैं तो उन्हें एक साथ हरिद्वार जाकर विसर्जित कर देते हैं. वहां भी विधि विधान से क्रिया कर्म पूरे किए जाते हैं. एक साल इसलिए रखते हैं ताकि कभी किसी मृतक के परिजन आएं तो उन्हें अस्थियां दे सकें. उन्होंने बताया कि पुलिस कार्रवाई होती है तो कोर्ट में भी जाना पड़ता है.”

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